मौलाना अरशद मदनी ने UCC का किया विरोध, बोले-दीन-धर्म से समझौता नहीं करेगा मुसलमान

Arshad Madani on UCC: जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के अमित शाह की घोषणा पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि 2029 से पहले NDA-शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू करने के बारे में गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) की घोषणा ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या देश संविधान से चलेगा या किसी राजनीतिक पार्टी के वैचारिक एजेंडे से? मौलाना ने कहा है कि मुसलमान हर चीज से समझौता कर सकता है, लेकिन अपने दीन और धर्म से हरगिज कोई समझौता नहीं करेगा। UCC पर भड़के

Written By :

SK Sharma

Updated

September 16, 2026

Arshad Madani

Arshad Madani on UCC: जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के अमित शाह की घोषणा पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि 2029 से पहले NDA-शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू करने के बारे में गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) की घोषणा ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या देश संविधान से चलेगा या किसी राजनीतिक पार्टी के वैचारिक एजेंडे से? मौलाना ने कहा है कि मुसलमान हर चीज से समझौता कर सकता है, लेकिन अपने दीन और धर्म से हरगिज कोई समझौता नहीं करेगा।

UCC पर भड़के अरशद मदनी

एक्स पर एक पोस्ट करते हुए Arshad Madani ने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह की घोषणा एक बुनियादी सवाल खड़ा करती है: क्या देश संविधान से चलेगा या किसी राजनीतिक पार्टी के वैचारिक एजेंडे से? मौलाना अरशद मदनी कहा कि यूसीसी लागू करना संविधान की सर्वोच्चता को कमजोर करने और नागरिकों को मिली धार्मिक स्वतंत्रता को खत्म करने की एक सोची-समझी कोशिश है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान, लोकतंत्र और कानून के शासन को बनाए रखना चाहती है; इसलिए, उसने यूसीसी के मामले में उत्तराखंड हाई कोर्ट का रुख किया है और अच्छे नतीजे की उम्मीद है। मदनी ने बताया कि उत्तराखंड हाई कोर्ट में पहले ही छह सुनवाई हो चुकी हैं, जिनमें वरिष्ठ वकील कपिल सिबल समेत कई वकील जमीयत का पक्ष रख रहे हैं।

शरीयत के खिलाफ कानून स्वीकार नहीं- मदनी

अरशद मदनी ने साफ तौर पर कहा कि वे ऐसा कोई कानून स्वीकार नहीं कर सकते जो शरिया के खिलाफ हो। मुसलमान भले ही दूसरे मामलों में समझौता कर लें, लेकिन वे अपने धर्म और दीन के मामले में कभी समझौता नहीं करेंगे। यह मुद्दा मुसलमानों के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों का है। UCC के जरिए सरकार मुसलमानों से वे अधिकार छीनना चाहती है जो उन्हें देश के संविधान से मिले हैं।

यूसीसी के नाम पर भेदभाव क्यों

उन्होंने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ इंसानों के बनाए कानून नहीं हैं, बल्कि पवित्र कुरान और हदीस पर आधारित हैं। जो लोग किसी धार्मिक पर्सनल लॉ के तहत अपने मामले नहीं चलाना चाहते, उनके लिए देश में पहले से ही वैकल्पिक सिविल कानून मौजूद हैं। ऐसे हालात में, एक अनिवार्य यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) क्यों जरूरी है? अरशद मदनी ने एक और अहम सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि अगर संविधान के प्रावधानों के तहत अनुसूचित जनजातियों को इस कानून से छूट मिल सकती है, तो संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मुसलमानों को मिली धार्मिक स्वतंत्रा का सम्मान क्यों नहीं किया जा सकता? यूसीसी के नाम पर यह भेदभाव क्यों?

दीन-धर्म से हरगिज समझौता नहीं करेगा मुसलमान

उन्होंने जोर देकर कहा कि यह मुद्दा सिर्फ मुस्लिम पर्सनल लॉ का नहीं है, बल्कि देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान को उसकी असली भावना के साथ बनाए रखने का है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, और धर्मनिरपेक्षता का मतलब है कि सरकार का अपना कोई धर्म नहीं है और नागरिक अपने धार्मिक मामलों में स्वतंत्र होते हैं। इसलिए ऐसा यूसीसी, जो धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करे, मुसलमानों के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती।

सरकार के “एक देश, एक कानून” जैसे नारों के बारे में अरशद मदनी ने बताया कि भारत का कानूनी ढांचा खुद ही अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मामलों के लिए अलग-अलग कानूनों की इजाजत देता है। राज्य स्तर पर आपराधिक कानूनों में भी अंतर और विशेष प्रावधान मौजूद हैं, और गोहत्या से जुड़े कानून भी पूरे देश में एक जैसे नहीं हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद लंबे समय से मांग कर रही है कि गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ का दर्जा दिया जाए ताकि पूरे देश में उसकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। उन्होंने कहा कि UCC लागू करने का मकसद नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता को कम करना और उनके संवैधानिक अधिकारों को सीमित करना है।

यूसीसी को लेकर को लेकर अमित शाह का प्लान

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा है कि 2029 से पहले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू किया जाएगा। मुस्लिम संगठन और विपक्षी पार्टियां इस कदम का विरोध कर रही हैं। वहीं, एनडीए के सहयोगी दल जेडीयू और एलजीपी भी इस मामले को लेकर असहज महसूस कर रहे हैं। वहीं समाजवादी पार्टी भी इसका विरोध कर रही है।


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