Dussehra 2026: दशहरा हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। इसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। यह यह पर्व बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है। यह पर्व हर वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके संसार को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। यह वजह है कि हर साल इस दिन भगवान श्रीराम की पूजा करने और रावण के पुतले का दहन किया जाता है।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी और रावण दहन से जुड़ी कई अनोखी परंपराएं और रीति-रिवाज हैं। हालांकि कुछ जगहों पर रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं है। बल्कि वहां दशानन की पूजा की जाती है। महाराष्ट्र के अकोला जिले में ऐसा ही एक गांव है जहां लंका के राजा रावण का दहन नहीं पूजा की जाती है।
संगोला गांव में होती है रावण की पूजा
अकोला से लगभग 40 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में, एक ही पत्थर से बनी रावण की एक मूर्ति है। इसमें उसे दस सिर वाले राजा के रूप में दिखाया गया है, जिसके हाथों में हथियार हैं। दशहरे के दिन, गांव वाले रावण का पुतला जलाने के बजाय, इसी मूर्ति की पूजा करते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि संगोला गांव में रावण की पूजा उसकी ‘विद्वता और तपस्वी गुणों’ के लिए की जाती है।
ग्रामीणों का मानना है कि रावण में कुछ बुराइयां थीं, तो वहीं उसमें कई खूबियां भी थीं। इसलिए, उसे केवल नफरत की नजर से देखने के बजाय, उसकी कमियों को छोड़कर उसके अच्छे गुणों को अपनाना चाहिए। इन्हीं खूबियों को ध्यान में रखते हुए, ग्रामीण पारंपरिक रूप से उसकी पूजा करते आ रहे हैं। जो सालों से चली आ रही है।
मंदिर के पुजारी ने क्या कुछ कहा
मंदिर के पुजारी बालकृष्ण जाधव की माने तो यह मूर्ति सैकड़ों साल पुरानी है। पुजारी ने कहा, “हमारे गुरुजी ने हमें बताया था कि रावण की मूर्ति को कहीं और से बैलगाड़ी में लाया जा रहा था। लाते समय, यह हमारे गांव की इस खास जगह से आगे नहीं बढ़ पाई। इसलिए, ग्रामीणों ने तय किया कि मूर्ति को यहीं स्थापित कर दिया जाए।”
उन्होंने आगे बताया कि हर शनिवार को नारियल तेल से मूर्ति की पूजा की जाती है, और साथ ही धूप, दीये और अगरबत्तियां भी जलाई जाती हैं। पुजारी का कहना है कि ग्रामीणों की राम और रावण, दोनों में आस्था है। वे रावण के पुतले नहीं जलाते। दशहरा के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां रावण की प्रतिमा देखने आते हैं, कुछ लोग तो पूजा-अर्चना भी करते हैं।
200 साल पुरानी है यहां की परंपरा
ग्रामीणों का दावा है कि यह मूर्ति 200 से 300 साल पहले गांव में स्थापित की गई थी। कहा जाता है कि पास ही चिखल नाम का एक गांव है, जहां यह मूर्ति मूल रूप से बनाई गई थी। जब इसे वहां से कहीं और ले जाया जा रहा था, तो पास बहने वाली एक नदी के किनारे यह मूर्ति आगे नहीं बढ़ पाई। मूल रूप से इस मूर्ति को गांव के दूसरी तरफ स्थापित किया जाना था, लेकिन इसे गांव की सीमा से आगे नहीं ले जाया जा सका। आखिरकार, इसे गांव के प्रवेश द्वार पर ही स्थापित कर दिया गया। तभी से यहीं इसकी पूजा की जा रही है। आज भी, एक पुजारी इस मूर्ति की रोज पूजा करते हैं यह परंपरा ग्रामीणों की गहरी आस्था से जुड़ी है।
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