UP Minority Commission Chairman: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूर्व मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के नेता मोहसिन रजा को राज्य अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया है। उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी मिलेगा। उनके साथ आयोग में आठ सदस्यों की नियुक्ति की गई है। यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब प्रदेश की राजनीति में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व, वक्फ संपत्तियों और मुस्लिम समाज तक राजनीतिक पहुंच जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में हैं।
मोहसिन रजा योगी सरकार के पहले कार्यकाल में अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ और हज विभाग में राज्य मंत्री रह चुके हैं। वह विधान परिषद के सदस्य भी रहे हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक आयोग की जिम्मेदारी उनके लिए केवल एक प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि उनकी पहले की राजनीतिक भूमिका के विस्तार के तौर पर भी देखी जा रही है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के रिकॉर्ड में भी रजा का भाजपा से जुड़ाव दर्ज है।
आयोग में आठ सदस्यों की भी नियुक्ति
सरकार की ओर से की गई नियुक्तियों में संदीप जैन, अंशुमान कुमार सिंह मैसी, हनप्रीत सिंह बेदी, मोहम्मद असलम, परविंदर सिंह, नेहा खान, सैयद सिराज अब्बास रिजवी और रूमाना सिद्दीकी को सदस्य बनाया गया है। अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि से सदस्यों को शामिल किए जाने से आयोग को व्यापक प्रतिनिधित्व देने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। आयोग की नई टीम के सामने अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मुद्दों, शिकायतों, कल्याणकारी योजनाओं और सरकार तक उनकी समस्याएं पहुंचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी। खासतौर पर वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवाद और उनके प्रबंधन का मुद्दा आने वाले समय में आयोग के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
वक्फ के मुद्दे से भी जुड़ी है रजा की भूमिका
मोहसिन रजा हाल के दिनों में वक्फ संपत्तियों से जुड़े मामलों को लेकर सक्रिय रहे हैं। 12 अगस्त को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के दौरान उन्होंने प्रदेश के दोनों वक्फ बोर्डों से जुड़ी कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया था। उन्होंने जिला स्तर पर वक्फ संपत्तियों की विशेष जांच और ऑडिट की मांग की थी। उनकी नई जिम्मेदारी को देखते हुए वक्फ से जुड़े मामलों पर उनकी भूमिका पर भी नजर रहेगी।
राजनीतिक नजरिये से अहम है नियुक्ति
इस नियुक्ति का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू 2027 का विधानसभा चुनाव है। भाजपा के सामने 2024 लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में अपने सामाजिक और चुनावी आधार को और मजबूत करने की चुनौती है। हालिया राजनीतिक विश्लेषणों में भी पार्टी की ओर से उन विधानसभा क्षेत्रों पर दोबारा पकड़ मजबूत करने की कोशिश का जिक्र हुआ है, जहां 2024 में विपक्षी गठबंधन को बढ़त मिली थी। ऐसे में अल्पसंख्यक आयोग की कमान भाजपा के अल्पसंख्यक चेहरे को सौंपना एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा सकता है। इसका उद्देश्य सीधे तौर पर पूरे मुस्लिम वोट बैंक को प्रभावित करना होगा, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। हालांकि, भाजपा यह संदेश देने की कोशिश जरूर कर सकती है कि अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मुद्दों पर सरकार के पास संवाद और संस्थागत प्रतिनिधित्व का रास्ता मौजूद है। मोहसिन रजा की नियुक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह भाजपा के भीतर मुस्लिम चेहरे के तौर पर लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। जुलाई में 2027 चुनाव को लेकर एक राजनीतिक कार्यक्रम में भी मुस्लिम प्रतिनिधित्व और भाजपा की चुनावी रणनीति पर उनसे सवाल हुए थे।
2027 के चुनाव पर कितना असर पड़ेगा?
इस फैसले का चुनावी असर तीन स्तरों पर देखा जा सकता है। पहला, भाजपा अपने समर्थक अल्पसंख्यक मतदाताओं और उन वर्गों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर सकती है जो सरकार की योजनाओं से लाभ लेने का दावा करते हैं। दूसरा, वक्फ, अल्पसंख्यक कल्याण और समुदाय से जुड़े स्थानीय मुद्दों पर सरकार का संवाद अधिक राजनीतिक रूप से संगठित हो सकता है। तीसरा, रजा की नियुक्ति पार्टी के भीतर अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का एक चेहरा सामने रखती है। हालांकि, केवल आयोग की नियुक्ति से चुनावी समीकरण बदल जाएंगे, ऐसा मानना उचित नहीं होगा। 2027 में बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, विकास, जातीय समीकरण, कल्याणकारी योजनाएं और स्थानीय उम्मीदवार जैसे कई मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करेंगे।
भाजपा के लिए चुनौती
राजनीतिक रूप से यह फैसला भाजपा के लिए outreach strategy का हिस्सा बन सकता है। लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि आयोग कितना सक्रिय रहता है, अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मामलों पर कितनी तेजी से कार्रवाई होती है और सरकार की योजनाओं का लाभ जमीन पर किस तरह पहुंचता है। यदि आयोग शिकायतों के समाधान, वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और अल्पसंख्यक कल्याण से जुड़े मुद्दों पर प्रभावी भूमिका निभाता है, तो भाजपा को संवाद का एक नया मंच मिल सकता है। इसके उलट, यदि नियुक्ति को केवल चुनावी संदेश के रूप में देखा गया और जमीनी स्तर पर अपेक्षित बदलाव नहीं दिखा, तो इसका राजनीतिक लाभ सीमित रह सकता है। इस लिहाज से मोहसिन रजा की नियुक्ति को 2027 से पहले भाजपा की सामाजिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश और संस्थागत स्तर पर अल्पसंख्यक संवाद मजबूत करने के कदम के रूप में देखना अधिक उचित होगा। आने वाले महीनों में आयोग की सक्रियता ही बताएगी कि यह फैसला राजनीतिक संदेश से आगे कितना प्रभावी साबित होता है।
ये भी पढ़ेंः-शहजाद पूनावाला ने BJP से दिया इस्तीफा , क्या राजनीति से हो गया मोहभंग
ये भी पढ़ें:-महिला पहलवान यौन शोषण केस , कोर्ट ने BJP के पूर्व सांसद बृजभूषण सिंह को किया बरी
(अन्य खबरों के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें। आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं…)

