चुनाव आयोग के समर्थन में 42 रिटायर्ड जजों ने लिखा खुला पत्र, SIR को सही बताया

नई दिल्ली: पूर्व न्यायाधीशों ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को सही ठहराया है। उन्होंने कहा है कि एसआईआर पहली बार नहीं कराए जा रहे हैं। चुनाव आयोग को 1950 की धारा 21(3) के तहत ऐसा अधिकार प्राप्त है। इसके अंतर्गत वह किसी भी समय मतदाता सूचियों में संशोधन कर सकता है। पत्र में कहा गया है कि आम चुनावों के बाद से कई बार गहन पुनरीक्षण किए जा चुके हैं। 20 साल पहले भी देश में एसआईआर कराया गया था। इससे पहले निर्वाचन आयोग ने भी स्पष्ट करते हुए बताया था कि एसआईआर प्रक्रिया में मृत व्यक्तियों

Written By :

SK Sharma

Updated

October 8, 2026

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नई दिल्ली: पूर्व न्यायाधीशों ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को सही ठहराया है। उन्होंने कहा है कि एसआईआर पहली बार नहीं कराए जा रहे हैं। चुनाव आयोग को 1950 की धारा 21(3) के तहत ऐसा अधिकार प्राप्त है। इसके अंतर्गत वह किसी भी समय मतदाता सूचियों में संशोधन कर सकता है। पत्र में कहा गया है कि आम चुनावों के बाद से कई बार गहन पुनरीक्षण किए जा चुके हैं।

20 साल पहले भी देश में एसआईआर कराया गया था। इससे पहले निर्वाचन आयोग ने भी स्पष्ट करते हुए बताया था कि एसआईआर प्रक्रिया में मृत व्यक्तियों के नाम, दोहरी प्रविष्टियां और दूसरे स्थान पर जा चुके लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं। साथ ही पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल करना करना एसआईआर का उद्देश्य है। पूर्व न्यायाधीशों ने इन तर्काें का समर्थन किया है। पत्र में कहा गया है कि दो दशकों में काफी लोगों ने रहने के स्थान बदले हैं। शहरीकरण के कारण मतदाता सूचियों में सुधार की जरूरत है।

दलों ने देश को कमजोर करने के प्रयास किए

विपक्षी दलों में कांग्रेस भारत की संवैधानिक संस्था पर बार बार प्रहार कर रही है। संवैधानिक संस्था पर सवाल उठाने से पहले उनके पास सबूत होने चाहिए, लेकिन सबूत लेकर वह जाएंगे कहां? उनको तो न्यायालय पर भी भरोसा नहीं है। यह बात देश के पूर्व न्यायाधीशों ने कही है। कांग्रेस पार्टी निर्वाचन आयोग के खिलाफ मोर्चाबंदी पर है और अब इस मोर्चाबंदी में वह खुद घिरती जा रही है। देश के 42 पूर्व न्यायाधीशों ने कांग्रेस समेत उन विपक्षी पार्टियों के खिलाफ आवाज उठाई है, जिन्होंने चुनावों की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग समेत संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाया है। आरोप है कि इन दलों ने देश को कमजोर करने के प्रयास किए हैं।

पूर्व जजों ने चेतावनी दी है कि चुनावों को बदनाम करने की कोशिशों से देश में अशांति को बढ़ावा मिल सकता है। इनकी कोशिश अराजक तत्वों को प्रोत्साहन करना भी हो सकता है। पूर्व न्यायाधीशों ने कहा है कि बारबार वोट चोरी का नारा देना गाली देना जैसे है। संविधान ही नहीं देश को कमजोर करने जैसा प्रयास संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना है। एक पत्र में आरोप लगाया गया है कि आलोचना अधिकार हो सकता है, लेकिन बदनाम करना अधिकार नहीे है।

संविधान के अनुच्छेद 324 से आयोग को अधिकार प्राप्त

बिना किसी सबूत के चुनाव आयोग पर कीचड़ उछालना लोकतंत्र में जनता के विश्वास को नुकसान पहुंचने जैसा है। पूर्व जजों ने एक पत्र में यह बातें लिखी हैं। इसमें कई महत्वपूर्ण तथ्यों मेें बताया गया है कि भारत में करीब एक अरब मतदाता, दस लाख से अधिक मतदान केंद्रों पर मतदान करते हैं। चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 से अधिकार प्राप्त है। संविधान निर्माताओं ने यही देखकर स्वतंत्र संस्था की मान्यता निर्वाचन आयोग को दी थी।

पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने निर्वाचन सूची को कार्यपालिका के नियंत्रण से बाहर रखा। यह मामला उच्चतम न्यायालय भी ले जाया गया लेकिन, वहां भी निर्वाचन आयोग के तर्काें को समर्थन मिला। पूर्व न्यायाधीशों ने एसआईआर को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक उद्देश्य को आगे बढ़ाने वाला बताया।

पत्र के जरिए यह समझाने की कोशिश की गई कि जहां कहीं भी सहमति नहीं बन पती है, वहां पर मतदाता या याची के पास पर्याप्त अधिकार हैं। इनमें नोटिस और आपत्ति के जरिए अपील और सुनवाई तक इंतजार करना चाहिए। पूर्व के कई चुनावों का हवाला देते हुए कहा गया कि सभी ने जनता के फैसले का सम्मान किया। लोकतेत्र में ऐसा ही आचरण होना चाहिए। कई साल एक ही पार्टी सत्ता में रही, लेकिन चुनाव के फैसलों को नकारा नहीे गया।

लोकतंत्र की बुनियाद जनता के विश्वास पर टिकी

कई बार परिणाम बदले और मर्यादित तरीके से सत्ता का हस्तांतरण हुआ। पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि लोकतंत्र की बुनियाद जनता के विश्वास पर टिकी है। जो महौल बनाया जा रहा है, उससे जनता का विश्वास टूट सकता है। संवैधानिक संस्था से भरोसा हट सकता है। मीडिया से भी अटकलों और अपुष्ट खबरें नहीं प्रसारित करने की अपील की है। पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि संवैधानिक संस्थाएं किसी सरकार की नहीं बल्कि भारत के लोगों की हैं।

पत्र में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल, जम्मू-कश्मीर एवं दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.सी. पटेल, कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुभ्रो कमल मुखर्जी, सिक्किम उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रमोद कोहली तथा गुजरात उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और गुजरात के पूर्व लोकायुक्त न्यायमूर्ति एस.एम. सोनी समेत विभिन्न उच्च न्यायालयों के 42 पूर्व न्यायाधीशों ने हस्ताक्षर किए हैं।


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