Putrada Ekadashi 2026: पुत्रदा एकादशी, संतान प्राप्ति के लिए महिलाएं रखती हैं व्रत

Putrada Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में पंचांग का बहुत महत्व है। कोई भी शुभ काम, यात्रा, निवेश या धार्मिक अनुष्ठान करने से पहले हमेशा इसे देखा जाता है। हिंदू आस्था में एकादशी का भी खास स्थान है। वहीं सावन महीने पड़ने वाली दूसरी एकादशी का विशेष महत्व है। वैदिक पंचांग के अनुसार, श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत संतान सुख, संतान की लंबी आयु और परिवार की

Written By :

SK Sharma

Updated

August 22, 2026

Putrada-Ekadashi

Putrada Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में पंचांग का बहुत महत्व है। कोई भी शुभ काम, यात्रा, निवेश या धार्मिक अनुष्ठान करने से पहले हमेशा इसे देखा जाता है। हिंदू आस्था में एकादशी का भी खास स्थान है। वहीं सावन महीने पड़ने वाली दूसरी एकादशी का विशेष महत्व है। वैदिक पंचांग के अनुसार, श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु के साथ देवी लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत संतान सुख, संतान की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए फलदायी होता है। हालांकि, इस बार व्रत की तारीख को लेकर कुछ उलझन है, क्योंकि एकादशी तिथि दो दिनों तक है। आइए जानते हैं कि पुत्रदा एकादशी का व्रत 23 अगस्त को रखा जाएगा या 24 अगस्त को।

कब रखा जाएगा पुत्रदा एकादशी का व्रत

पंचांग के अनुसार, इस साल पुत्रदा एकादशी तिथि 23 अगस्त की रात को लगभग 2:00 बजे शुरू होगी और 24 अगस्त की सुबह 4:18 बजे समाप्त होगी, जिसके बाद द्वादशी तिथि शुरू हो जाएगी। उदय तिथि के आधार पर, एकादशी का व्रत 23 अगस्त को रखा जाएगा। सावन पुत्रदा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा का शुभ समय सुबह 7:32 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक बताया गया है। व्रत का समापन (पारण) 24 अगस्त 2026 को होगा। 23 अगस्त को सूर्य ‘मघा नक्षत्र’ में स्थित होंगे, जबकि चंद्रमा शाम 5:44 बजे तक ‘मूल नक्षत्र’ में रहेंगे और उसके बाद ‘पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र’ में प्रवेश करेंगे।

पुत्रदा एकादशी पूजा विथि

ब्रह्म मुहूर्त में उठें, नहाएं और साफ कपड़े पहनें।
पूजा की जगह साफ करें और भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर लगाएं।
भगवान को पीले फूल, तुलसी के पत्ते, फल और पंचामृत चढ़ाएं।
विष्णु सहस्रनाम, श्री हरि स्तोत्र, या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
पूरे दिन व्रत रखें और सात्विक लाइफस्टाइल अपनाएं।
शाम को, भगवान विष्णु की आरती करें और भोग (पवित्र भोजन) चढ़ाएं।

पुत्रदा एकादशी का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुत्रदा एकादशी को संतान प्राप्ति और संतान की सुख-समृद्धि से जुड़ा हुआ। मान्यता है कि जिन दंपतियों को प्राप्ति की इच्छा है, वे इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रख सकते हैं, भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा कर सकते हैं और संतान सुख पाने के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। वहीं, जिन लोगों की पहले से संतान है, वे भी अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए यह व्रत रख सकते हैं।

दरअसल श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली पुत्रदा एकादशी का जिक्र पद्म पुराण के उत्तराखंड खंड के 55वें अध्याय में मिलता है। जिसमें युधिष्ठिर खुद श्री कृष्ण से श्रावण शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी के नाम के बारे में पूछते हैं, और भगवान श्री कृष्ण इसे पुत्रदा एकादशी बताते हैं।

साथ ही श्री कृष्ण राजा महिजीत की कहानी सुनाते हैं। राजा बहुत धर्मात्मा थे लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी, जिससे वे बहुत चिंतित रहते थे। उनकी प्रजा ने ऋषि लोमश से इसका उपाय पूछा। ऋषि लोमश ने बताया कि राजा ने पिछले जन्म में कोई गलत काम किया था, जिसकी वजह से उन्हें इस जन्म में माता-पिता बनने का सुख नहीं मिल पा रहा था। उपाय के तौर पर, उन्होंने श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने और उससे मिलने वाले पुण्य फल को राजा को सौंपने का सुझाव दिया।

प्रजा ने बताए गए नियमों के अनुसार व्रत रखा और उसका पुण्य राजा को समर्पित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, रानी गर्भवती हुईं और उन्होंने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। इसी कारण से, संतान प्राप्ति के आशीर्वाद के लिए इस व्रत को रखना फायदेमंद माना जाता है। इसे रखने से मानसिक शांति और नकारात्मक ऊर्जा से राहत भी मिल सकती है।


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