Kartik Purnima 2025: कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली पर काशी में उमड़ा आस्था का सैलाब, श्रद्धालुओं ने गंगा में लगाई डुबकी

Kartik Purnima 2025: कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली पावन अवसर बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में बुधवार को आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। लाखों भक्तों ने ‘हर हर गंगे’ के जयकारे लगाते हुए पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाई और गंगा के किनारे दीपक जलाए और दान-पुण्य के काम किए। भक्त पवित्र स्नान के लिए सुबह 3 बजे से ही गंगा घाटों पर आने लगे थे। स्नान और पूजा सुबह से दोपहर तक चलती रही। शहर के प्राचीन दशाश्वमेध घाट, शीतला घाट, अहिल्याबाई घाट, पंचगंगा घाट, अस्सी घाट, केदार घाट, खिड़किया घाट और भैंसासुर घाट पर पवित्र स्नान के

Written By :

SK Sharma

Updated

November 5, 2025

Kartik Purnima

Kartik Purnima 2025: कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली पावन अवसर बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में बुधवार को आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। लाखों भक्तों ने ‘हर हर गंगे’ के जयकारे लगाते हुए पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाई और गंगा के किनारे दीपक जलाए और दान-पुण्य के काम किए। भक्त पवित्र स्नान के लिए सुबह 3 बजे से ही गंगा घाटों पर आने लगे थे। स्नान और पूजा सुबह से दोपहर तक चलती रही।

शहर के प्राचीन दशाश्वमेध घाट, शीतला घाट, अहिल्याबाई घाट, पंचगंगा घाट, अस्सी घाट, केदार घाट, खिड़किया घाट और भैंसासुर घाट पर पवित्र स्नान के लिए भक्तों की भारी भीड़ जमा हुई। भक्तों की भारी संख्या के कारण घाट मेले जैसे लग रहे थे। कार्तिक पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर मंगलवार की शाम श्रद्धालुओं ने दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए दीपदान किया। इससे गंगा तट जगमगा उठे। वहीं जिला प्रशासन ने सुरक्षा बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात किया था।

Kartik Purnima 2025: पौराणिक कथाएं

सनातन धर्म में, कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने शक्तिशाली राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया था। इन मान्यताओं से प्रेरित होकर, भक्तों ने गंगा में पवित्र स्नान किया। लोगों का मानना है कि कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा में या तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

एक और कहानी के अनुसार, महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद, पांडव युद्ध में अपने रिश्तेदारों की असमय मृत्यु से बहुत दुखी थे। वे सोच रहे थे कि उनकी आत्माओं को शांति कैसे मिलेगी। उनकी चिंता देखकर, भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने के तरीके बताए। इस अनुष्ठान में कार्तिक शुक्ल अष्टमी से कार्तिक पूर्णिमा तक की प्रथाएं शामिल थीं। कार्तिक पूर्णिमा पर, पांडवों ने अपने पूर्वजों की आत्माओं की शांति के लिए गढ़मुक्तेश्वर में तर्पण (पूर्वजों को जल अर्पित करना) किया और दीपक जलाए।

आज ही के दिन धरती पर आई थी तुलसी माता

एक और पौराणिक मान्यता यह है कि कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवी तुलसी की शादी भगवान विष्णु से उनके शालिग्राम रूप में हुई थी, और पूर्णिमा के दिन देवी तुलसी वैकुंठ (भगवान विष्णु के निवास) पहुंची थीं। इसलिए, कार्तिक पूर्णिमा पर देवी तुलसी की पूजा का खास महत्व है। मान्यताओं के अनुसार, देवी तुलसी कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही धरती पर आई थीं। इस दिन भगवान नारायण को तुलसी चढ़ाने से दूसरे दिनों की तुलना में ज़्यादा पुण्य मिलता है।


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