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---(श्वेता सिंह)

आज मेरे शहर की सड़कों का नजारा कुछ अलग ही था। यातायात व्यवस्था चुस्त- दुरुस्त नजर आ रही थी और जगह- जगह अपने वाहनों के साथ वाहन मालिक ट्रैफिक पुलिस से गिड़गिड़ाते नजर आ रहे थे। 

---(श्वेता सिंह)

आज मेरे शहर की सड़कों का नजारा कुछ अलग ही था। यातायात व्यवस्था चुस्त- दुरुस्त नजर आ रही थी और जगह- जगह अपने वाहनों के साथ वाहन मालिक ट्रैफिक पुलिस से गिड़गिड़ाते नजर आ रहे थे। 

कई चौराहों के नुक्क्ड़ों पर चालान पर्ची के साथ पुलिस विभाग के आला अफसर मौजूद होकर यातायात नियमों का पालन न करने वालों को एक कतार में खड़ा कर रहे थे। ये सब देखकर एकाएक दो साल पहले वाला वो हादसा दिमाग में कौंध आया, जब मैं अपनी पढ़ाई के सिलसिले में अपने शहर से दूर थी। एक दिन पापा का फ़ोन आया ; उन्होंने हड़बड़ाते हुए बताया कि हमारे गांव के कुछ लोगों का एक्सीडेंट हो गया है। जैसे ही मैंने ये खबर सुनी , दौड़ते हुए हॉस्पिटल पहुंची तो वहां का नजारा देख विचलित हो गयी। चारों तरफ चीख- पुकार मची हुयी थी। मेरे पड़ोसी और कई ग्रामवासी वहां थे , इनमे से कई तो बेहोश थे और कईयों के चेहरों की पट्टियों  ने उनकी पहचान छिपा दी थी। अस्पताल से सूचना मिली कि  3 लोग मृत घोषित कर दिए गए हैं ; जिनके शव पोस्टमार्टम हाउस में थे।  वहां पहुंची तो देखा मेरे एक अंकल ;जिनकी गोद में मैं बचपन में खेली थी , उनके छत- विछत शव को एक गट्ठर में बांधकर लाया जा रहा था। अपनों की ऐसी दुर्दशा देखकर मैं खुद को संभाल नहीं पायी। बाद में इस हादसे के पीछे की वजह पता चली की तड़के वो सभी किसान अपने खेतों में उगाई सब्जियों को बेंचने के लिए शहर आ रहे थे ; तभी हाईवे पर एक तेज रफ़्तार ट्रक ने उनकी गाडी में जोरदार टक्कर मार दी , जिससे गाडी ओवरब्रिज के नीचे गिर गयी। इस हादसे के बाद मैं आज तक नहीं उबर पायी। अस्पताल के वो दृश्य अब भी मेरे मन को विचलित कर जाते हैं। जब भी मैं घर के बाहर सड़क पर कदम रखती हूँ; मेरे अभिभावकों के माथे पर चिंता की एक लकीर अवश्य होती है। 

हमारे देश में आए दिन ऐसे हादसे किसी न किसी के प्रिय को उनसे छीन लेते हैं और कभी न कम होने वाला दर्द दे जाते हैं। भारत में सबसे ज़्यादा लोग चलते-चलते मारे जाते हैं। वे ठीक ठाक घर से निकलते हैं- सब्ज़ी लेने के लिए, स्कूल जाने के लिए, दफ़्तर जाने के लिए, कहीं घूमने के लिए- मगर कभी कुचल दिए जाते हैं, कभी अपनी ही हड़बड़ाई हुई रफ़्तार के शिकार हो जाते हैं और कभी किसी गाड़ी वाले- कार वाले, बस वाले की जल्दबाज़ी में किसी खड्ड में जा गिरते हैं। आंकड़ों के हवाले से  साल 2017 में सड़क हादसों ने 20,457 पैदल यात्रियों की बलि ले ली।  विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर वर्ष 10 लाख से अधिक लोग सड़क हादसों के शिकार व्यक्ति की मौत हो जाती है।औसत रूप से देखें तो देश की सड़कों पर होने वाले हादसों में रोज 56 पैदल यात्रियों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है।कुछ समय पहले केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने जानकारी दी थी कि भारत में हर साल करीब पांच लाख सड़क हादसे होते हैं जिनमें लगभग डेढ़ लाख लोग जान गंवाते हैं।इस जानकारी का क्या मतलब है? जब हमारे सामने इतनी बड़ी संख्या आती है तो वह हमारी समझ और संवेदना के पार चली जाती है। लोग या हादसे बस आंकड़ों में बदल जाते हैं और हम उनकी असली त्रासदी से बेख़बर रह जाते हैं। 

इतने सड़क हादसे क्यों होते हैं? कुछ जवाब बेहद जाने-पहचाने हैं। हमारे यहां सड़क-परिवहन का हाल बहुत बुरा है। न क़ायदे की सड़कें हैं न उन पर ट्रैफिक के नियम लागू होते हैं। सड़कों पर पर्याप्त डिवाइडर नहीं हैं, पूरी रोशनी नहीं है, रेड लाइट की उचित व्यवस्था नहीं है, ड्राइवरों के समुचित प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है, ड्राइविंग लाइसेंस लेने के लिए नियम बड़ी आसानी से तोड़े जाते हैं, ट्रक ड्राइवरों को बहुत ही लंबी और थका देने वाली ड्यूटी करनी पड़ती है और वे कभी नींद में और कभी हड़बड़ी में हादसे के शिकार हो जाते हैं।

बहरहाल, यह साफ़ है कि चीन हो या भारत- यहां लोगों की जान सस्ती है। हैरानी की बात यह है कि डेढ़ लाख लोगों के मारे जाने का सवाल हमारे यहां कभी राजनीतिक मुद्दा नहीं बनता. सड़क, बिजली और पानी के सवाल पर भारत में बहुत चुनाव ल़ड़े जाते हैं। लेकिन सड़क हादसों पर किसी की नज़र नहीं पड़ती। हमें आतंकवाद सालता है, नक्सलवाद सालता है, दंगे सालते हैं, मगर सड़क हादसे नहीं सालते- क्या इसलिए कि ज़्यादातर ये उन लोगों की ज़िंदगी में घटते हैं जो बड़े मामूली लोग होते हैं- जो कभी-कभी फुटपाथ पर सोए होने की सज़ा भी भुगतते हैं?

पैडमेन और टॉयलेट एक प्रेम कथा जैसी फिल्मों से सामाजिक विषयों पर बात करने वाले अक्षय कुमार भी पिछले दिनों 'सड़क सुरक्षा, जीवन रक्षा' का संदेश देते नजर आए। दरअसल सोशल मीडिया पर अक्षय कुमार ने कुछ वीडियो शेयर किए हैं जिसमें वे लोगों को सड़क पर ट्रेफिक नियमों करने के प्रति जागरूक कर रहे हैं।वीडियो में देख सकते हैं कि, अक्षय कुमार ट्रैफिक पुलिस की वर्दी में 'सड़क सुरक्षा, जीवन रक्षा' का संदेश देते नजर आ रहे हैं। अक्षय कुमार ने दिल्ली में केंद्रीय सड़क परिवहन एंव राजमार्ग मंत्री नीतिन गड़करी के साथ 'सड़क सुरक्षा, जीवन रक्षा' जागरूकता अभियान की शुरूआत की है। केंद्रीय सड़क परिवहन एंव राजमार्ग मंत्रालय ने इस अभियान के लिए अक्षय कुमार को ब्रांड एम्बेसडर बनाया है। 

हम हर दिन सड़कों पर अपने काम के सिलसिले से निकलते हैं। कोई स्कूल , कोई आफिस में जाते हैं। सड़क पर हम जब भी निकलते हैं। तब हम कुछ बातों का पालन करते हैं। जैसे-- सड़क के नियम। सड़कों के नियम ही सड़क से हमारी सुरक्षा करते हैं।जैसे ट्रैफिक सिग्नल, जेब्रा क्रासिंग का हमें पालन अवश्य करना चाहिए।बाइक चलाते वक्त हेलमेट अवश्य पहनना चाहिए एवं कार चलाते वक्त सीट बेल्ट अवश्य बांधना चाहिए। एक बात तो गांठ बांध लें कि रास्ता पार करते वक्त हमें हेडफोन नहीं लगाना है और सिगनल को फालो करना है।साथ ही यातायात व्यवस्था को सुधारने की कड़ी में ट्रैफिक पुलिस को अतिक्रमण और अवैध पार्किंग के खिलाफ सघन अभियान चलाना चाहिए । अवैध ई-रिक्शा, ठेले- खोमचे; जो कहीं भी अपना अड्डा जमा लेते हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। इन सभी चीजों के लिए राजधानी लखनऊ के एसएसपी कलानिधि नैथानी एक तगड़ा उदाहरण हो सकते हैं। 

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